कलीसिया के लिए परामर्श - Contents
- प्रस्तावना
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भूमिका
- अध्याय 1 - विश्वासियों के प्रतिफल के विषय में दर्शन
- अध्याय 2 - अन्त का समय
- अध्याय 3 - अपने परमेश्वर से मिलने को तैयार हो जाइये
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अध्याय 4 - परमेश्वर के पवित्र सब्बत का पालन
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अध्याय 5 - परमेश्वर के पास आप के लिए काम है
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अध्याय 6 - मैं यहाँ हूँ! मुझे भेज
- अध्याय 7 - कलीसिया के प्रकाशन
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अध्याय 8 - भंडारीपन के संबंध में परामर्श
- “जितने अपनी इच्छा से देना चाहें’‘
- दशमांश परमेश्वर द्वारा नियत किया गया है
- परमेश्वर के साथ सहकारी बनने का सौभाग्य
- परमेश्वर पैदावार का दसवाँ भाग चाहता है
- परमेश्वर दानों का मूल्य प्रेम-उत्तेजित त्याग के अनुसार लगता है
- सम्पत्ति का यथोचित बटवारा
- “चाहे धन सम्पत्ति बढ़े तौभी उस पर मन न लगा.’‘
- जो वाचा परमेश्वर से बांधी जाय वह लागू तथा पवित्र है
- कृतज्ञता का दान कंगालों के लिए अलग रखना चाहिये
- आत्मात्याग और बलिदान की भावना
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अध्याय 9 - मसीह के साथ मेल और भ्रातृ प्रेम
- अध्याय 10 - मसीह हमारी धार्मिकता
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अध्याय 11 - पवित्र जीवन
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अध्याय 12 - पृथ्वी पर की कलीसिया
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अध्याय 13 - कलीसिया का संगठन
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अध्याय 14 - परमेश्वर का घर
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अध्याय 15 - गलती करने वाले से व्यवहार
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अध्याय 16 - दरिद्रता तथा दुःख संकट की ओर मसीह का दृष्टिकोण
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अध्याय 17 - समस्त संसार के मसीही मसीह में एक हो जाते हैं
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अध्याय 18 - व्यक्तिगत परमेश्वर पर विश्वास
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अध्याय 19 - मसीही परमेश्वर को प्रगट करें
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अध्याय 20 - कलीसिया के लिए साक्षियाँ
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अध्याय 21 - [ बाइबल ] धर्म शास्त्र
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अध्याय 22 - जगत में पर जगत के नहीं
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अध्याय 23 - पवित्र आत्मा
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अध्याय 24 - प्रार्थना की सभा
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अध्याय 25 - बपतिस्मा
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अध्याय 26 - प्रभु भोज
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अध्याय 27 - पति अथवा पत्नी का चुनाव
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अध्याय 28 - अविश्वासियों के साथ विवाह न कीजिए
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अध्याय 29 - विवाह
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अध्याय 30 - आनंदमय सफल सांझेदारी
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अध्याय 31 - पति-पत्नी में परस्पर सम्बन्ध
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अध्याय 32 - माता और बालक
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अध्याय 33 - मसीही माता-पिता
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अध्याय 34 - मसीही घर
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अध्याय 35 - कुटुंब में आत्मिक अभाव
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अध्याय 36 - कुटुम्ब में आर्थिक व्यवस्था
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अध्याय 37 - छुट्टियों अथवा जयन्ती उत्सवों में कौटुम्बिक व्यवहार
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अध्याय 38 - मनोरंजन
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अध्याय 39 - मस्तिष्क के वे भाग जिनकी रक्षा करनी चाहिए.
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अध्याय 40 - अध्ययन में चुनाव
- अध्याय 41 - संगीत
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अध्याय 42 - आलोचना और प्रभाव
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अध्याय 43 - वस्त्रों के विषय में सलाह
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अध्याय 44 - नौजवानों से एक विनती
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अध्याय 45 - हमारे बालकों की उचित शिक्षा और अच्छा अनुशासन
- माता-पिता का सहमत होना आवश्यक है
- अति निष्ठुर प्रशिक्षण का भय
- बालकों को अज्ञानता में बढ़ने देना पाप है
- आलस्य की बुराई
- माता-पिता अपने बच्चों को मसीह तक लाने का प्रयत्न कीजिए
- मानसिक आवश्यकताओं की अपेक्षा मत कीजिए
- गुस्से में बालक की ताड़ना न कीजिए
- बालको के साथ सच्ची विश्वास योग्यता का महल
- चरित्र विकास का महत्व
- माता पिता को ईश्वरीय अगुवाई को अत्यधिक आवश्यकता
- सौजन्यता और आदर भाव सिखलाइए
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अध्याय 46 - मसीही शिक्षा
- कलीसिया का दायित्व
- हमारे विद्यालयों को नैतिक सहयोग
- शिक्षक परमेश्वर के अधीन हैं
- अध्यापक की योग्तायें
- मसीही शिक्षा में बाइबल का स्थान
- छोटी उम्र में बालकों को स्कूल भेजने का खतरा
- व्यावहारिक जीवन के कर्तव्यों में शिक्षण का महत्व
- परिश्रम में गौरव
- मातृभाषा की उपेक्षा न हों
- परमेश्वर नास्तिकों की कृतियों को अस्वीकार करता है
- मसीही शिक्षा का परिणाम
- अपने स्कूल का समर्थन करने में विद्यार्थी का दायित्व
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अध्याय 47 - संयमी जीवन व्यतीत करने के लिये बुलाहट
- अध्याय 48 - सफाई का महत्व
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अध्याय 49 -हमारा भोजन
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अध्याय 50 - मांसाहार
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अध्याय 51 - स्वास्थ्य सुधार में विश्वस्तता
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अध्याय 52 - मनुष्य के साथ परमेश्वर के सम्बंध को साफ रखिए
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अध्याय 53 - हृदय और जीवन की पवित्रता
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अध्याय 54 - रोगियों के लिये प्रार्थना
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अध्याय 55 - चिकित्सा सम्बन्धी कार्य
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अध्याय 56 - जो हमारे विश्वास व मत के नहीं उनके साथ सम्बन्ध
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अध्याय 57 - सरकारी शासनकर्ताओं तथा कानूनों से
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अध्याय 58 - शैतान की धोखे बाजी का काम
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अध्याय 59 - नकली विज्ञान शैतान का आधुनिक उज्वल वस्त्र
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अध्याय 60 - शैतान के झूठे अद्भुत कार्य
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अध्याय 61 - आने जवाली सूक्ष्य घड़ी
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अध्याय 62 - छंटनी का समय
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अध्याय 63 - याद रखने की बातें
- अध्याय 64 - मसीह-हमारा महायाजक
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अध्याय 65 - यहोशू और स्वर्गदूत
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अध्याय 66 - “देख मैं शीघ्र आने वाला हूँ’‘